garibnathdham.in बाबा गरीबनाथ धाम Baba Garib Nath Dham

Baba Garib Nath Dham

बाबा गरीबनाथ धाम का आधिकारिक वेबसाइट

An History of Baba Garib Nath Dham :

बाबा गरीबनाथ शिवलिंग का प्राकट्य कब हुआ इसकी सही जानकारी उपलब्ध नहीं हैं। सन 2006 ई. में बिहार राज्य धार्मिक न्यास पार्षद ने मंदिर का अधिग्रहण किया और मंदिर की व्यवस्था के लिए ग्यारह सदस्यों का एक ट्रस्ट बनवाया गया। मंदिर प्रांगन में जो कल्पवृक्ष जिनकी पूजा होती है वे शिवलिंग के प्राकट्य से भी ज्यादा पुराना है । श्रावण मास में कावरिओं द्वारा सोनपुर से गंगाजल लाकर बाबा पर अर्पित करने की तीव्र शुरुआत सन 1960 के आस-पास से की गई । शिवलिंग जहाँ प्रकट हुए वह क्षेत्र पहले जंगल था ।

An Introduction of Baba Garib Nath Dham :

बाबा गरीबनाथ धाम जाग्रत शिव-स्थल के रूप में निरंतर प्रसिद्द हो रहा है । यहाँ दूर दूर से आनेवाले श्रद्धालु भक्तों की आस्था इनके दर्शनोंप्रान्त और भी गहरी होती चली जाती है।

जन-जन का विश्वास देवाधिदेव महादेव में अकारण ही नहीं है।शिव सबके है ।जो भी शुद्ध मन और विश्वास के साथ इनके द्वार पर आता है,उसे दर्शन से केवल कृतार्थ ही नहीं करते बल्कि उसकी मनोकामना भी पूरी करते है। उसके दुखो को दूर करके उसके जीवन में सुख और आनंद का संचार करते है। जीवन के प्रति अटूट विश्वास और आत्मा के प्रति सजगता का निरंतर सन्देश देते हुए शिव समदर्शी भाव में सहज ही विराजते रहते है। उनके यहाँ कोई विभेद नहीं। जिसने भी उनका स्मरण किया,उनकी पूजा-अर्चना की उसी के वे हो गए । विषम परिस्थिति में भी शांतचित और शांतभाव से रहने की प्रेरणा देते हुए शिव चेतना के उस शिखर पर विराजते रहते है जहा से सबकुछ को सहज ढंग से देखा-समझा जा सकता है। संसार को संकटों से मुक्त कर देने वाला ही ‘शंकर’ होता है। सबके जीवन की रक्षा करने के लिए कालकूट विष का पान कर लेने वाला ही ‘शिवशंकर’ होता है । ओधर,आशुतोष भोलेदानी ही सही अर्थ में ‘गरीबनाथ’ होते है। जिसका कोई नहीं ईश्वर उसका सबसे ज्यादा होता है। शिव सबके अंतर्मन को झंकृत करते हुए आनंदमय वातावरण में जीव को खींच कर ले जाते है।

बाबा गरीबनाथ जन-जन के महानायक है। दूर-सुदूर से पावन गंगाजल कंधे पर कांवर में सहेज कर कठिन डगर को पार करते हुए आस्था और उल्लाष से भरे हुए आबाल्ब्रिध स्त्री-पुरुष भक्त श्रद्धालु यहाँ आ कर गंगाजल से बाबा का अभिषेक करते है ।बाबा उसकी आस्था को स्वीकार करते हुए उसके मन को तृप्त करते है ।कांवर -यात्रा जनास्था का महान सांस्कृतिक पर्व है ।इस आस्था और यात्रा को हार्दिक प्रणाम।

वर्तमान बिहार में मुजफ्फरपुर के बाबा गरीबनाथ ख्यातिप्राप्त सिद्ध शिवलिंग के रूप में मान्य है । बाबा गरीबनाथ के प्रादुर्भाव और मंदिर विकास से जुडी हुई कथाएं है । ठीक -ठीक नहीं कहा जा सकता की पहली बार यहाँ कब कांवर का जल चढ़ाया गया । मगर अब तो इनकी महिमा का इतना विस्तार हो गया है कि बिहार ,उत्तर -प्रदेश,मध्य -प्रदेश के साथ ही साथ देश के अनेक प्रान्तों के शिव -भक्त यहाँ जलाभिषेक के लिए आते है । पड़ोसी देश नेपाल से आने वालों की संख्या भी अच्छी -खासी रहती है । वर्ष भर दर्शनार्थियों तथा पूजा करने वालों की भीड़ यहाँ लगी रहती है ।

पवित्र सावन मास में पहलेजा से गंगा जल को कांवर पर लेकर आने वाले असंख्य कांवरियों के द्वारा हर सोमवारी के साथ ही साथ हर दिन व्यापक जलाभिषेक किया जाता है ।सावन भर कावरिया पथ पर केसरिया वस्त्रों से सुसज्जित आबालवृद्ध स्त्री -पुरुषों का बोलबम जयघोष गूंजता रहता है ।अनेकानेक स्वमसेवी संगठनों ,भक्तों -श्रधालुओं ,नागरिकों तथा विभिन्न प्रतिष्ठानों के द्वारा शिविर लगाकर कांवरियों की हर तरह की सेवा की जाती है ।इसके लिए उनके भीतर साक्षात् शिव ही प्रेरणा भरते है ।

Few Stories that came across the mind of people :

बाबा गरीबनाथ के प्रादुर्भाव की कुछ कथाएं हैं जो निम्नलिखित है |

पहली कथा
एक मजदूर था उसी की कुल्हाड़ी के प्रहार से शिवलिंग का प्राकट्य हुआ है ।वह क्षेत्र उस समय जंगल था और मजदूर कुल्हाड़ी से वृक्ष की कटाई कर रहा था। लिंग पर अभी भी कटे हुए का निशान हैं। गरीबनाथ जन के नाम पर ही गरीबनाथ के नाम से बाबा प्रचलित हो गए। यह भी कहा जाता है की शिवलिंग पर कुल्हाड़ी का वार पड़ते ही लिंग से रक्त की धरा निकली थी।

दूसरी कथा
मुजफ्फरपुर शहर में एक साहूकार था जिसके फैले हुए व्यवसाय की देख-रेख एक मुंशी जी किया करते थे। मुंशी जी बाबा गरीबनाथ के परम भक्त थे। एकाएक साहूकार को व्यवसाय में घटा लगा और मुंशी जी की नौकरी चली गयी।

मुंशी जी अपनी पत्नी और विवाहित पुत्री के साथ जीवन जी रहे थे। मुंशी जी की पुत्री की शादी एक संपन्न घराने में हुई थी,समय के साथ पुत्री के गौना का दिन निकट आ रहा था लेकिन इस कार्य के लिए धन की वयवस्था नहीं हो पा रही थी। परन्तु मुंशी जी नियमपूर्वक मंदिर आया करते थे और बाबा की विधिपूर्वक पूजा किया करते थे। पुत्री के गौना हेतु मुंशी जी ने अपनी जमीन बेचने का निश्चय किया लेकिन इस दिन निबंधक के न आने से मकान की रजिस्ट्री नहीं हो सकी। मुंशी जी बड़े दुखी मन से घर लौटे और पत्नी को सारी कथा सुनाई। पत्नी ने आश्चर्य से मुंशी जी की ओर देखा और कहा की कुछ देर पहले ही तो आप पकवान बनाने का सारा सामान ,गहना ,कपड़ा रखकर मंदिर गए थे ।

ये सभी गौना का सामान स्वं बाबा गरीबनाथ ने ही मुंशी भक्त के यहाँ पहुचाएँ थे और मुंशी जी ने धूमधाम से पुत्री का गौना किया। चुकि मुंशी जी गरीब थे और बाबा ने गरीब का कल्याण किया इसलिए बाबा का नाम गरीबनाथ पड़ गया ।

तीसरी कथा
तीसरी कथा के अंतर्गत बाबा के गर्भगृह में राजमिस्त्री द्वारा शिवलिंग के चारो तरफ थोड़ी खुदाई की जा रही थी जिसमे शिवलिंग के चारो ओर कवर लगाया जा सके। राजमिस्त्री ने शिवलिंग के नीचे हाथ डाला तो उसे बाबा का पूरा जटा हाथ में स्पर्श करता हुआ मालूम हुआ और वह डर से मूर्छित हो गया ।मंदिर के लोगों ने उसे संभाला और होश आने पर उसने सारी बात बताई । साथ ही साथ उसने यह भी कहा की वह बिना स्नान किये यह कार्य कर रहा था । दूसरे दिन स्नान-ध्यान कर बाबा से माफ़ी मांग कर कार्य प्रारंभ किया उसे कार्य करने पर कोई कठिनाई नहीं आई ।

चौथी कथा
चौथी कथा यह है की एक दिन सुबह बाबा की आरती हो रही थी और आरती के समय ही वट-वृक्ष के तने से लटककर एक सर्प तबतक झूलता रहा जबतक की आरती ख़त्म नहीं हो गई , आरती ख़त्म होने के बाद सर्प अदृश्य हो गया। इस स्थिति का फोटोग्राफ मंदिर के रिकॉर्ड में उपलब्ध है ।

पांचवी कथा
अगली कथा है की एक ट्रेन ड्राईवर था जो बाबा का अनन्य भक्त था। शिवरात्रि के दिन ड्राईवर मंदिर आया । बाबा की पूजा कर उसकी आँखें लग गई और वह सो गया । उसी दिन उसे ट्रेन लेकर मुजफ्फरपुर से बाहर जाना था ।जब उसकी नींद खुली तो वह काफी घबरा गया और उसने स्टेशन फ़ोन किया फ़ोन पर स्टेशन से जानकारी मिली की वह ड्राईवर जो सो गया था ट्रेन लेकर मुजफ्फरपुर से बाहर जा चुका है । यह कुछ नहीं बल्कि बाबा स्वयं ट्रेन ड्राईवर के रूप में गए थे। इस अद्भुत चमत्कार से ड्राईवर इतना प्रभावित हुआ की वह रेलवे सेवा से त्यागपत्र देकर बाबा की सेवा में दिन-रात लग गया ।

ऐसी एक नहीं अनेक कथाएँ हैं ।भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और फिर बाबा की भक्ति में अपने को समर्पित कर देते हैं ।

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